प्रकृति कर ली है श्रृंगार, सर्वत्र छा गया है बहार, अवनि है बन-ठन तैयार, कर रहा रूह को इज़हार, ठिठुरन का हो गया अंत, आ गया है बसंत... मलयानिल-झोंका है…