प्रकृति कर ली है श्रृंगार,

सर्वत्र छा गया है बहार,

अवनि है बन-ठन तैयार,

कर रहा रूह को इज़हार,

ठिठुरन का हो गया अंत,

आ गया है बसंत...


मलयानिल-झोंका है लाया,

स्निग्ध स्पर्शों से सिहराया,

कोकिल कुहू तान सुनाया,

सुषुप्त सिम्तों को जगाया,

हर्षित है देखो दिग दिगंत,

आ गया है बसंत...


बह रहा झूम बसंती पवन,

पल्लवित-पुष्पित है चमन,

अखिल संसृति में है अमन,

मादकता छा रही कण-कण,

खेत-पथार है कोमल कंत,

आ गया है बसंत...


मधुऋतु का अनूप समय,

तन-मन हो गए प्रसूनमय,

अमराई में बौर झूल गए,

टेसू, बेल भी निकल गए,

देखो, शर्मा रहा है हेमन्त,

आ गया है बसंत...


मानस पा लिया नई सहर,

उठ रहे उर में असीम लहर,

हरा-भरा हो हर भावी डगर,

गतिमान रहें सदा प्रेम-समर,

आच्छादित रहें सत्य अनंत,

आ गया है बसंत...